• असम में इस साल बाढ़ ने मचाई काफी ज्यादा तबाही की
  • बाढ़ से आदिवासी बहुल इलाके काफी प्रभावित हैं

असम में हर साल ब्रह्मपुत्र नदी का पानी बढ़ता है लेकिन इस साल मानो अंधमत आ गया है। मरने वालों का आंकड़ा 89 तक पहुंच गया है। हजारों लाखों अभी भी विदे हैं या रिलीफ कैंपों में मदद के सहारे हैं। सिर्फ शहर ही नहीं गांव के गांव जलमग्न हैं। सरकार की ओर से मदद तो पहुंचाई जा रही है लेकिन यह और व्यापक करने की जरूरत है।

असम में ब्रह्मपुत्र के महाप्रलय की ऐसी ही तस्वीर आप तक लाने के लिए आज तक संवाददाता आशुतोष मिश्रा शुक्रवार को ब्रह्मपुत्र नदी से होकर गुजरे। असम के जोरहाट जिले में ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे न जाने ऐसे कितने गांव हैं जिनकी सड़कें बाढ़ के कारण शहर से कट चुकी हैं और अब वहां भी मदद-बड़ी-बड़ी नाव के सहारे पहुंचाई जा रही है। ऐसे ही रिलीफ बोट के साथ आज तक की टीम ब्रह्मपुत्र के प्रवाह को पार करते हुए इसके चपेट में आए गांवों तक पहुंची।

आपदा इतनी बड़ी है कि मदद के लिए प्रशासन के भी हाथ-पैर फूल रहे हैं। सर्कल ऑफिसर सूरज कमल बरुवा बताते हैं की बाढ़ के कारण सड़कों पर राहत सामग्री ले जाने वाली गाड़ियां वर्तमान में नहीं जा सकतीं इसलिए ब्रह्मपुत्र के ऊपर से होकर गुजरना ही एकमात्र रास्ता है।

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जैसे ही ब्रह्मपुत्र नदी का कलेजा चीरते हुए नाव आगे बढ़ी। ब्रह्मपुत्र का विस्तार अथाह होता चला गया। साल के eight महीने यह नदी असम की लाइफ लाइन होती है। लेकिन मॉनसून के four महीने में ये जिंदगियों को अपनी चपेट में ले लेती है। ब्रह्मा का बेटा कही जाने वाली इस नदी के साथ असम की संस्कृति और सभ्यता जुड़ी है। इस नदी के साथ भूपेन हजारिका का रिश्ता जुड़ा है। लेकिन महाप्रलय की इस घड़ी में इस नदी ने हर किसी से अपना रिश्ता मानो तोड़ लिया है।

ब्रह्मपुत्र की विकराल धारा कुछ दूर पार करने के बाद जब नाव एक दिशा में आगे बढ़ी तो मनोरर मोड़ होता चला गया। गाँव के गाँव जलमग्न दिखाई पड़े। ऊंचे क्षेत्रों में जानवरों ने शरण ले रखी है तो निचले इलाकों में दुकान-मकान सब जलमग्न हैं। जहां सड़क है वहां जमीन अंदाजा भी लगाना मुश्किल है। ब्रह्मपुत्र ने इतना भैरह रूप अख्तियार किया है जिसके कारण कुछ भी नहीं बचा है। वादी का मंजर चारों ओर नजर आ रहा है।

एक लंबी यात्रा तय करने के बाद पूर्वी जोरहाट में ब्रह्मपुत्र नदी से कुछ दूरी पर आज तक की टीम हाथी खाल गांव पहुंची। मूल 23 गांव में उत्तर भारत के प्रवासी और असम की जनजातियाँ रहती हैं। बाढ़ के चलते इनका गांव किसी टापू में तब्दील हो गया है जो चारों ओर से पानी से घिरा है। ऐसे में यहाँ रहने वाले न खेती कर रहे हैं न ही शहरों तक जा सकते हैं। सरकार की ओर से राशन की बड़ी खेप गांव तक लाई गई है।

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महाप्रलय की तस्वीरों को अपने कैमरे में कैद करने के साथ ही आज की टीम ने अपनी एक छोटी सी जिम्मेदारी भी तोड़ दी। आज तक की ओर से कैर टुडे की कलाई पर वहाँ की महिलाओं और बच्चों के लिए कुछ राहत सामग्री प्रदान करने की कोशिश की गई। प्रशासन के साथ मदद की इस छोटी सी कोशिश में प्रशासन भी मददगार रहा। खाने-पीने की चीजों के बच्चों के चेहरे पर मुस्कान ले आईं तो मुखौटा, सैनिटाइजर और सैनिटरी नैपकिन उन महिलाओं के लिए बड़ी मदद साबित हुई जो न जाने अगले कितने दिनों तक सड़कें डूब जाने की वजह से शहरों से और बुनियादी सुविधाओं से वंचित रहेंगी।

बाढ़ से बेबस चेहरा और मजबूरी की कई कहानियां उस गांव में हैं। प्रवासियों ने आज तक से अपनी व्यथा सुनाते हुए कहा कि अगर इमरजेंसी हो जाए तो जोरहाट में नाव से पहुंचने में ही 2 से ढाई घंटे का समय लग जाता है। हर कोई दहशत के साए में जी रहा है।

आज तक की टीम का अगला ठिकाना माजरा सापोर गांव था। इन क्षेत्रों में असम की मिसिंग जनजाति बड़ी तादाद में रहती है। पारंपरिक रूप से उनके घर की जमीन से 10 से 12 फीट ऊंचे ही बनाए जाते हैं लेकिन पानी इस बार घर की चौखट तक दस्तक दे चुके हैं। मदद के थोड़े से सामान के साथ आज तक की टीम ने छोटी सी नाव के बारे में मिसिंग जनरीज के गांव में पहुंचने की कोशिश की।

छोटे-छोटे बच्चे गांव के एक तरफ से दूसरी तरफ जाने के लिए नाव का इस्तेमाल करते दिखाई दिए। जाहिर है नदी के तेज प्रवाह में उनकी जिंदगी भी खतरे में है। जान जोखिम में डालकर यहां जीवन जीने के लिए साधन जुटाती है। मिसिंग जनजातियों के गांव माजरा सापोर में कुदरत के कहर की तस्वीर डराने लगती है। यह हाल तब है जब ब्रह्मपुत्र का पानी काफी हद तक गिर गया है। लोग बताते हैं कि जब पानी अंदर आया तो जमीन से ऊंचे बने उनके घर के फर्श तक को छूने लगा था।

मिसिंग ट्राइब की महिलाओं ने आज तक कहा कि बाढ़ के पानी के कारण उनके सामने पीने का पानी की कमी सबसे बड़ी समस्या बन गई है। बाढ़ की वजह से गांव का नल और कुआँ जलमग्न हो गए हैं। यह लोग इसी बाढ़ के पानी को साफ करके पीते हैं

मदद की सामग्री आज तक की टीम ने गांव के लोगों को सौंप दी। एक छोटी सी कोशिश से उनके चेहरे पर जो मुस्कुराहट आई उसका कोई मोल नहीं। लेकिन तस्वीर इतनी भयावह है जो चीख-चीख कर कहती है कि सरकार को मदद का चार्टररा बढ़ाना होगा क्योंकि इस बार आपदा हर साल से बड़ी है।

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